दोस्तों बहुत पुराने समय की बात है, जब किसी शहर में एक महान राजा का शासन था। राजा का बेटा सरोज था । सरोज बहुत होशियार और साहसी युवक था। वह हमेशा नई-नई चीजें सीखने का शौकीन था।
एक दिन, शहर के राजधानी में एक बड़ा मेला लगा। वहाँ दूर-दूर के व्यापारी आए हुए थे। वे अजीबो-गरीब सामान बेच रहे थे। सरोज भी मेले में घूमने गया। वहाँ उसे एक ऐसा व्यापारी मिला जो एक लकड़ी का बना घोड़ा बेच रहा था। वह घोड़ा देखने में बहुत सुंदर था। उसका रंग सुनहरा था और आँखों में हीरे जड़े हुए थे। लेकिन वह घोड़ा साधारण नहीं था।
व्यापारी ने कहा, “यह जादुई घोड़ा है। इसमें सवार होकर आप हवा में उड़ सकते हैं। जहाँ चाहें, जा सकते हैं।”
सरोज को यह घोड़ा बहुत पसंद आ गया। वह उत्सुक हो गया। उसने व्यापारी से पूछा, “यह कैसे काम करता है?”
व्यापारी ने मुस्कुराते हुए कहा, “इसके कान के पास एक कुंजी है। उसे घुमाओ तो यह उड़ने लगेगा। दाहिने कान की कुंजी से ऊपर चढ़ेगा, बाएँ से नीचे उतरेगा। लेकिन सावधान रहना, इसे सही से संभालना पड़ेगा।”
सरोज ने सोचा, यह तो कमाल की चीज है! वह राजा से अनुमति लेकर घोड़ा खरीद लिया। घर लौटकर उसने घोड़े को आजमाया। कुंजी घुमाई तो वाकई में घोड़ा हवा में उड़ने लगा। सरोज खुशी से चिल्लाया, “यह तो चमत्कार है!”
अगले दिन, सरोज ने सोचा कि क्यों न इस घोड़े पर सवार होकर कहीं दूर घूम आएँ। वह अपने दोस्तों को बुलाया और कहा, “चलो, हम इस जादुई घोड़े पर उड़ान भरें।”
दोस्तों ने हामी भर ली। वे सब घोड़े पर सवार हुए। सरोज ने दाहिने कान की कुंजी घुमाई। घोड़ा धीरे-धीरे ऊपर उठा और फिर तेजी से हवा में उड़ चला। नीचे शहर छोटा-छोटा दिख रहा था। नदियाँ चमक रही थीं, पहाड़ हरे-भरे लग रहे थे। दोस्तों ने तालियाँ बजाईं। लेकिन अचानक, घोड़ा तेज रफ्तार पकड़ लिया। सरोज को कुंजी संभालने में देर हो गई। घोड़ा बेकाबू हो गया। वह सीधा बादलों की ओर भागा। दोस्त चिल्लाने लगे, “रुक जाओ! नीचे उतरो!” लेकिन घोड़ा नहीं रुका।
कई घंटों तक उड़ान चली। सूरज ढल गया। रात हो गई। आखिरकार, घोड़ा एक अज्ञात द्वीप पर उतर गया। सरोज और उसके दोस्त थक चुके थे। वे घोड़े से उतरे। चारों ओर घना जंगल था। न तो कोई इंसान दिखा, न कोई रास्ता। दोस्त डर गए। उन्होंने कहा, “यह क्या मुसीबत ला दी! अब हम कैसे लौटेंगे?”
सरोज ने हिम्मत जुटाई। “चिंता मत करो। मैं घोड़े को ठीक करके सबको घर पहुँचा दूँगा।” लेकिन घोड़ा अब काम नहीं कर रहा था। कुंजी खराब हो गई लगती थी। सरोज ने घोड़े को ठीक करने की कोशिश की, लेकिन वह मिस्त्री नहीं था। दोस्त गुस्सा हो गए। उन्होंने सरोज को दोष दिया। झगड़ा हो गया। आखिरकार, दोस्तों ने सरोज को छोड़ दिया और जंगल में भटकने लगे। सरोज अकेला रह गया।
सरोज उदास हो गया। वह सोचने लगा, “मैंने लालच में यह घोड़ा खरीदा, अब सब बर्बाद हो गया।”
वह जंगल में घूमने लगा। अचानक, उसे एक सुंदर महल दिखा। महल सफेद संगमरमर का बना था। चारों ओर बगीचे थे, फूल खिले हुए थे। सरोज ने दरवाजा खटखटाया।
अंदर से एक बूढ़ा दरबान आया। उसने पूछा, “तुम कौन हो?”
सरोज ने अपनी कहानी सुनाई। दरबान दया करके उसे अंदर ले गया। महल के मालिक एक अमीर व्यापारी थे। उन्होंने सरोज का स्वागत किया। खाना खिलाया। सरोज ने आराम किया।
अगले दिन, व्यापारी ने सरोज से कहा, “यह द्वीप जयचंद का नाम से जाना जाता है। यहाँ की राजकुमारी शहजादी बहुत सुंदर है। वह हर साल एक उत्सव मनाती है, जिसमें दूर-दूर के राजकुमार आते हैं। लेकिन कोई उसे जीत नहीं पाया।”
सरोज को उत्सुकता हुई। वह बोला, “मैं भी देखना चाहूँगा।”
व्यापारी ने हामी भरी। वे दोनों महल गए। वहाँ राजा का दरबार सजा था। संगीत हो रहा था। नाच-गाना चल रहा था। बीच में राजकुमारी का सिंहासन था। वह इतनी सुंदर थी कि चाँद भी शरमा जाए। उसकी आँखें काली मोतियों सी चमक रही थीं। सरोज को पहली नजर में प्यार हो गया।
उत्सव में एक प्रतियोगिता हुई। जो राजकुमार राजकुमारी को प्रभावित करेगा, वही उसे पा सकेगा। कई राजकुमार आए। उन्होंने गीत गाए, नृत्य किया, तोहफे दिए। लेकिन राजकुमारी किसी को पसंद न आई। सरोज सोच में पड़ गया। उसके पास तो कोई तोहफा भी नहीं था। अचानक, उसे जादुई घोड़ा याद आया। वह द्वीप पर लाया था न! वह घोड़े को साफ-सुथरा करके लाया। राजकुमारी के सामने खड़ा किया। सब हैरान हो गए।
सरोज ने कहा, “यह जादुई घोड़ा है। देखिए!” उसने कुंजी घुमाई। घोड़ा हवा में उड़ने लगा। राजकुमारी खुशी से उछल पड़ी। “यह तो चमत्कार है!” सबने तालियाँ बजाईं। राजकुमारी ने कहा, “यह घोड़ा मुझे बहुत पसंद आया। तुम्हें मैं अपना पति चुनती हूँ।”
सरोज खुश हो गया। लेकिन समस्या थी। वह तो शहर से भागा हुआ था। उसके दोस्त गायब थे। राजकुमारी ने कहा, “चिंता मत करो। हम घोड़े पर सवार होकर तुम्हारे शहर चलेंगे।” लेकिन घोड़ा अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं था। सरोज ने राजा से अनुमति मांगी। राजा ने शादी की तैयारियाँ शुरू कर दीं। शादी भव्य ढंग से हुई। सरोज और राजकुमारी सात फेरे ले चुके थे। अब लौटने का समय आया। सरोज ने घोड़े को ठीक करने की कोशिश की। लेकिन कुंजी अभी भी जाम थी। वह उदास हो गया। राजकुमारी ने सांत्वना दी, “हम किसी और तरीके से जाएँगे।”
तभी, द्वीप पर एक बूढ़ा जादूगर आया। वह घोड़े को देखा। बोला, “यह मेरा ही बना घोड़ा है। मैं ही ठीक कर सकता हूँ।”
सरोज ने विनती की। जादूगर ने एक मंत्र पढ़ा। कुंजी ठीक हो गई। घोड़ा फिर से उड़ने लगा। सरोज और राजकुमारी घोड़े पर सवार हुए। वे हवा में उड़ चले। नीचे द्वीप छोटा होता गया। वे सीधे शहर की ओर बढ़े। रास्ते में वे कई जगह रुके। एक जगह जंगल में उतरे। वहाँ उन्हें सरोज के दोस्त मिले। दोस्त भूखे-प्यासे थे। सरोज ने उन्हें खाना खिलाया। दोस्त शर्मिंदा हो गए। उन्होंने माफी मांगी। सब मिलकर घोड़े पर सवार हो गए।
शहर पहुँचकर सरोज ने राजा को सारी कहानी सुनाई। राजा बहुत खुश हुआ। राजकुमारी को देखकर आश्चर्यचकित हो गया। उसने कहा, “बेटा, तुमने तो चमत्कार कर दिया।”
पूरे शहर में उत्सव मनाया गया। जादुई घोड़ा राजमहल में रखा गया। सरोज और राजकुमारी सुखी जीवन बिताने लगे। दोस्तों ने भी सबक सीखा। वे कभी लालच नहीं करते। जादूगर को इनाम दिया गया।
सीख- दोस्तों हमें इससे यही सिख मिलती है की साहस और बुद्धि से कोई भी मुश्किल हल हो सकती है।
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