Friday, June 12, 2026

चालाक डॉक्टर

गुजराती लड़के ने बेरोजगारी में क्लिनिक खोलकर लिखा – “200 रुपये में इलाज, न हुआ तो 1000 रुपये वापस!” 

गुजरात के एक छोटे से कस्बे में एक युवक रहता था, जिसका नाम था सुरेश। सुरेश बहुत मेहनती और होशियार था, लेकिन नौकरी की तलाश में उसे बार-बार निराशा ही हाथ लगी। वह सरकारी दफ्तरों में घूमा, प्राइवेट कंपनियों के इंटरव्यू दिए, हर जगह से यही जवाब मिला—“अभी वैकेंसी नहीं है” या “आपका प्रोफाइल सूट नहीं कर रहा”। 

महीनों की बेरोजगारी ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया। एक दिन उसने अपने दोस्त से कहा, “भाई, अब नौकरी नहीं मिल रही तो खुद कुछ कर लेते हैं।” दोस्त ने मजाक में कहा, “डॉक्टर बन जा!” सुरेश ने सोचा और मुस्कुराते हुए बोला, “क्यों नहीं? लेकिन असली डॉक्टर बनने के लिए तो सालों लग जाते हैं। मैं कुछ और ही करता हूँ।”

उसने अपने छोटे से घर के सामने एक पुरानी दुकान को साफ-सुथरा करके एक क्लिनिक बना लिया। बाहर एक बड़ा-सा बोर्ड लगाया, जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था:

“दो सौ रुपये में इलाज करवाइए।  

इलाज न हुआ तो एक हजार रुपये वापिस!”

यह बोर्ड देखकर पूरा कस्बा हँस पड़ा। लोग कहने लगे, “ये क्या नया चक्कर है? दो सौ में इलाज और न हुआ, तो हजार वापिस? ये तो घाटे का सौदा है!” लेकिन सुरश बिल्कुल निश्चिंत था। उसने अंदर एक टेबल, दो कुर्सियाँ, एक पुराना स्टूल और कुछ खाली बॉक्स लगा दिए। एक नर्स की ड्रेस पहने अपनी बहन को भी साथ रख लिया। क्लिनिक का नाम रखा— “गुजराती हेल्थ केयर”।

पहले कुछ दिन तो कोई आया नहीं। फिर एक दिन कस्बे के प्रसिद्ध पंडित जी, जिनका नाम था पंडित बाबुराम  पाठक, क्लिनिक के सामने से गुजर रहे थे। बोर्ड पढ़कर उनकी आँखें चमक उठीं। उन्होंने सोचा, “अरे वाह! एक हजार रुपये कमाने का शानदार मौका है। मैं इस लड़के को उल्लू बनाकर पैसे वसूल लूँगा।”

पंडित जी क्लिनिक के अंदर घुसे और सुरेश से बोले, “बेटा, मुझे किसी भी चीज का स्वाद नहीं आता। खाना बिल्कुल फीका लगता है। मेरा इलाज कर दो।”

सुसुरेश मुस्कुराया और शांत स्वर में बोला, “कोई बात नहीं पंडित जी। नर्स, बॉक्स नंबर २२ से दवा निकालो और तीन बूँद पिला दो।”

नर्स ने तुरंत एक छोटी शीशी निकाली और पंडित जी को तीन बूँद पिला दी। जैसे ही दवा उनके मुंह में गई, पंडित जी चीख पड़े, “अरे! ये तो पेट्रोल है! मेरी जुबान जल रही है! क्या बकवास है ये?”

सुरेश हँसते हुए बोला, “मुबारक हो पंडित जी! आपको टेस्ट महसूस हो गया। मतलब इलाज हो गया। अब लाइए तीन सौ रुपये।”

पंडित जी का चेहरा लाल हो गया। उन्होंने गुस्से में पैसे दिए और सोचते हुए बाहर निकले, “इस बदमाश को मैं अभी दिखाता हूँ।”

कुछ दिन बाद पंडित जी फिर से क्लिनिक पर पहुँचे। इस बार उन्होंने नया प्लान बनाया था। वे सुरेश के सामने बैठे और बोले, “साहब, मेरी याददाश्त बहुत कमजोर हो गई है। कुछ भी याद नहीं रहता। क्या इलाज है?”

सुरेश ने बिना किसी भाव के कहा, “ठीक है। नर्स, फिर बॉक्स नंबर २२ से दवा निकालो और तीन बूँद पिला दो।”

नर्स ने वही शीशी निकालकर तीन बूँद पंडित जी को पिला दी। पंडित जी फिर चीखे, “अरे! ये तो वही पेट्रोल है! तुम मुझे फिर से ठग रहे हो!”

सुरेश शांतिपूर्वक बोला, “अरे पंडित जी, आपकी याददाश्त तो वापस आ गई। आपने तुरंत पहचान लिया कि ये वही दवा है जो जुबान के टेस्ट के लिए थी। इलाज सफल! लाइए तीन सौ रुपये।”

पंडित जी इस बार और भी ज्यादा गुस्से में थे। उन्होंने पैसे दिए और बाहर निकलते हुए मन ही मन बदला लेने की ठान ली।

तीसरी बार, लगभग एक हफ्ते बाद, पंडित जी फिर आए। अब वे सीधे सुरेश के सामने बैठ गए और बोले, “देखो बेटा, मेरी नजर बहुत कमजोर हो गई है। दूर की चीजें बिल्कुल दिखाई नहीं देतीं। तुम्हारे पास इसकी कोई दवाई है?”

सुरेश ने थोड़ा सोचा और फिर बोला, “पंडित जी, इसकी दवाई तो मेरे पास नहीं है।”

पंडित जी की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने सोचा, “अब तो एक हजार रुपये वापिस मिलेंगे!” वे खुशी से बोले, “तो फिर बोर्ड के अनुसार मुझे एक हजार रुपये वापिस कर दो!”

सुरेश ने जेब से एक नोट निकाला और पंडित जी की तरफ बढ़ाते हुए बोला, “लो, ये लो एक हजार रुपये।”

पंडित जी ने नोट लेते ही चौंककर कहा, “अरे! ये तो पाँच सौ का नोट है! तुम मुझे ठग रहे हो!”

सुरेश जोर से हँस पड़ा और बोला, “अरे पंडित जी! आ गई न आपकी नजर! अब तो साफ-साफ दिख रहा है कि ये पाँच सौ का नोट है। इलाज हो गया! अब लाइए तीन सौ रुपये।”

पंडित जी के मुँह से बोल नहीं निकला। वे हैरान और गुस्से से भरे हुए खड़े रह गए। पूरा क्लिनिक हँसी से गूँज उठा। 

सुरेश ने पंडित जी की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “पंडित जी, अब आप समझ गए न कि गुजराती लड़के को ठगना इतना आसान नहीं है। इलाज तो हो गया, लेकिन पैसे तो देने ही पड़ेंगे।”

पंडित जी सिर झुकाकर तीन सौ रुपये रखकर चुपचाप बाहर निकल गए। उस दिन के बाद वे कभी उस क्लिनिक की तरफ नहीं गए। 

सुरेश का क्लिनिक धीरे-धीरे प्रसिद्ध हो गया। लोग मजाक में कहने लगे, “अगर तुम्हें कोई बीमारी नहीं है, तो भी सुरेश के क्लिनिक जाकर इलाज करवा लो, कम से कम हँसी तो जरूर आएगी। वैसे भी  हँसी सबसे अच्छी दवा है।”

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