दोस्तों बूढ़े-बुजुर्ग के मुह से सुनने में आता ही रहता है की भक्ति में शक्ति होती है। दोस्तों आपके परिवार में भी लोग भक्ति के लिए प्रेरित करते होंगे। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है की वास्तव में भक्ति में शक्ति होती है। जी हा....बिलकुल होती है, अगर लगन हो कुछ पाने की तो कुछ भी असंभव नहीं है।
आज के इसी लेख में हम आपको कुछ भक्ति में लीन एक भक्त की कहानी को बताएँगे जो भक्ति के लिए अपना सब कुछ लुटा देता है।
भगवान का एक भक्त जिसका नाम हरी प्रसाद था। वह खूब भजन करता , खूब साधना करता, भगवान् का जप करता और भक्ति करता, कथा सुनते। लेकिन वह विवाह नहीं करते। उनकी इक्छा थी जैसे वह भजन, कथा सुनते वैसे ही अगर कोई लड़की मिलती है तो तभी शादी करेंगे।
तभी वहा हरी प्रसाद के एक रिश्तेदार की आने की आवाज सुनाई देता है। और वह रिश्तेदार कहता है की हरी प्रसाद तुम्हारे लिए एक कन्या देख लिया है, बिलकुल तुम्हारे जैसा।
तभी हरी प्रसाद बीच में ही बोल पड़ता है की क्या गुण है उस कन्या में बताओ। रिश्तेदार बोलता है उस कन्या में वही गुण है जो गुण तुम्हारे अन्दर है। लेकिन उस कन्या का एक शर्त है की जिससे भी वह विवाह कर करेगी। उसको रोज एक हजार संतो को भोजन पवाना (खिलाना) पड़ेगा। अगर मेरे इस शर्त को मानेगा उसी से वह विवाह करेगी।
हरी प्रसाद ने कहा अब हमको मुहूर्त की जरुरत नहीं है। कल ही मेरा विवाह करवा दो। अगले दिन विवाह संपन्न हुआ। और शर्त के अनुसार रोज एक हजार संतो को भोजन कराया जाने लगा। हरी प्रसाद की कमाने का कोई भी जरिया नहीं था। जो भी उसके पुरखो ने सोना-चांदी, जेवरात जमा कर रखा था। धीरे धीरे वह खाली होने लगा। 6 महीने तक संतो को भोजन खिलाने की सिलसिला चलता रहा। आखिरकार घर में रखे सभी खजाने खली हो गए। चाहकर भी कुछ कर भी नहीं पता क्योकि शर्त जो रखी थी अपने पत्नी से।
अब गाँव के अमिर लोगो से उधार लेना चालू कर दिया। और संतो को भोजन कराता रहा। धीरे-धीरे सभी गाँव के अमीर लोगो से उधार ले लिया और चूका न सके। तो अब उधर मिलना भी बंद हो गया और उसके घर पर उधर वालो का जमावड़ा होने लगा। अब उधर मिलना भी बंद और पैसे भी ख़त्म । अब क्या करे
अब वह घरो से चोरी करता । वह भी केवल रसोई में रखे सामान ही चोरी करता जैसे- आटा, चावल, चीनी, दाल आदि जिससे संतो को भोजन खिला सके। धीरे धीरे चोरी का सिलसिला चलता रहा और गाँव वालो ने चोरी होते देख अपने घरो में निगरानी करना चालू कर दिए। अब हरी प्रसाद के मुस्किले बढ़ने लगी। अब तो एक उपाय था की रास्ते में आने जाने वाले के कीमती सामान को छिनैती किया जाए।
अपने भक्त की सारी लीला हमारे ठाकुर जी देख रहे थे। तो उसने हरी प्रसाद को दर्शन देने के लिए उठ खड़े हुए। और एक जमीदार के भेष को धारण कर लिए और गले में सोने के आभूषण, पैर में सोने की जूते और दसो उंगलियों में सोने की अंगूठी धारण कर लिए और चल दिए पृथ्वीलोक की तरफ।
रास्ते में उनका भक्त चोरी के इरादे से बैठा हुआ था। और जमीदार को आते देख खुश हो गया, और मन ही मन सोचने लगा की इतने सोने चांदी को लूटकर 5 साल तक संतो को भोजन खिला सकूँगा।
इतना कहकर जमीदार को लाठी दिखाई और बोलने लगा की जितने भी जेवर तुमने पहन रखे हो सब निकल दो, वरना यही पर पिट-पिट कर मर डालूँगा। इतना सुन जमीदार थर थर कापने का नाटक करने लगा और एक-एक करके सभी जेवर को निकल दिए। इतने में जमीदार यानी की ठाकुर जी अपने असली भेष में आ गए। यह देख हरी प्रसाद फुट-फुट कर रोने लगा और पैर पकड़ कर रोने लगा। माफ़ी मागने लगा। तो ठाकुर जी से कहने लगा की हमने अपने पत्नी को वचन दिया था की हर रोज हजार संतो को भोजन खिलाऊंगा। जिससे हमारे सभी पुस्तैनी खजाने खली हो गए, और हमको ये गलत रास्ता अपनाना पड़ा।
प्रभु बोले - हरी प्रसाद इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है। तुम अपने लिए नहीं कर रहे थे, बल्कि उन संतो के लिए कर रहे थे। तुमने तो अपने लिए कुछ नहीं किया। तुमने तो पुण्य का काम किए हो।
जाओ ये सोने सभी सोने के सामान तुम्हारे हुए। इससे तुम संतो को दस सालो के लिए बल्कि जब तक तुम जिंदा रहोगे, तब तक ये ख़तम नहीं होगा। यह कहकर ठाकुर जी वह से गायब हो गए।

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